कुछ अल्फ़ाज़

                
                                                             
                            अपनी मुफ्लिसी को खुद जिया जाए
                                                                     
                            
किसी और पर इल्ज़ाम न दिया जाए

कैसे बिताए हैं वो दिन तेरे बिन
अब उस वक्त को और वक्त ने दिया जाए

यूं ही बीत गई है धुंध में पूरी जिंदगी
खुला आसमां दिखाकर और बीमार न किया जाए

लम्हा लम्हा में मदहोश हुआ जाता हूं
अब मुझे और कोई जाम में दिया जाए

अब वक्त जा चुका है बात करने का
जो हक़ न मिले तो छीन लिया जाए

तेरी महफिल में मेरी बात खत्म हो गई
अब मेरे नाम कोई पैगाम में दिया जाए

ख्वाहिश उठी है हाकिम से मिलने की
फिर एक और इल्जाम अपने सिर लिया जाए

मैं तो एक फूल हूं लुटा के खुशबू चला जाऊंगा
मेरी पहचान को कोई नाम न दिया जाए


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8 months ago
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