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मेरे अल्फाज़

बच पाई कैसे प्रीति

Vineeta Tewari

43 कविताएं

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दर्द घाव और टीस
दुसह्य चुभन के बीच
बच पाई कैसे प्रीत
कैसे बन पाया गीत

जड़ता लघुता कटुता
बन गए मनुज के अंग
ममता समता कोमलता
उड़ गई पवन के संग
नि:शब्द गगन के बीच
कैसे गूंजा संगीत
कैसे बच पाई प्रीत
कैसे बन पाया गीत

धरती है समृद्ध पर
जलद हुआ अवरुद्ध
सूखे पड़ जाते खेत
बंजर मानो हो रेत
जल ही जीवन है मीत
सुनता आया यह गीत
यदि होता में समर्थ
आंसू से देता सींच
कैसे बच पाई प्रीत
बन पाया कैसे गीत

जग होता पल पल क्रूर
प्रलय नहीं अब दूर
उड़ जाने को अधीर
मन पंछी ढूंढे नीड़
यह कैसी जग की रीति
कैसे पाऊँ मनमीत
बच पाई कैसे प्रीत
कैसे बन पाया गीत

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