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मेरे अल्फाज़

तो क्या हुआ

Vikash Sharma

2 कविताएं

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तरकस मेँ तीर नही तो क्या हुआ
झंकार होनी चाहिए
हाँथो मेँ हथियार नही तो क्या हुआ
रक्त मेँ उबाल होना चाहिए
जैसे भी हो अब ये स्वाभिमान जागना चाहिए
मुँह मेँ शब्द नही तो क्या हुआ
आवाज होनी चाहिए
आँखो मेँ अश्क नही तो क्या हुआ
जज्बात होने चाहिए
जैसे भी हो अब उन्हे यह समझना चाहिए
सूर्य नही तो क्या हुआ
दीप होना चाहिए
प्रभा के प्रभात मे नही तो क्या हुआ
तमी के तिमिर मे जलना चाहिए
जैसे भी हो अब यहाँ उजाला होना चाहिए
थक गये तो क्या हुआ
फिर खडा होना चाहिए
देवता नही हो सके तो क्या हुआ
इंसान बनना चाहिए
जैसे भी हो अब तुम्हे यह कर्म करना चाहिए

- विकाश शर्मा

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