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मेरे अल्फाज़

पिता

Anonymous User

13 कविताएं

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सुख है तो दुःख है, जिन्दगी के दो पल है ।
नर को निराशा से क्या घबराना?
आशा की घड़िया किसके संग सब दिन है?
आज मातम की घड़ी कल फिर खुशियों का दिन है ।
सुख है तो दुःख है , जिन्दगी के दो पल है ।।1।।

आज जो रिश्ते बने, कल को वह टूटने है ।
फिर किस बात का रोना, किस बात का गम है ।
आज जो इमारत खड़ी, कल वो ढ़हने है ।
फिर क्यूँ नये-पुराने सपनों का गम है?
सुख है तो दुःख है, जिन्दगी के दो पल है ।।2।।

निभाते है कुछ लोग रिश्ते जैसे कि वो शाश्वत हो ।
यूँ ही लोग भूल जाते है रिश्ते जैसे कि वो स्वार्थ के भागी हो ।
जहां के इस रिश्ते में टूटते-बिखरते, जुटते नर है ।
फिर क्यूँ चलती राह पे जिन्दगी के किस्से सुनाना है?
सुख है तो दुःख है, जिन्दगी के दो पल है ।।3।।

आज जन्म हुआ तो कल को जाना है ।
मौत को स्वीकृति से गले लगाना है ।
फिर क्यूँ जिन्दगी से मोह, मौत से डर है?
इससे भी पहले तो बहुत गये बहुते मरे है ।
सुख है तो दुःख है, जिन्दगी के दो पल है ।।4।।

।। कवि ।। विकास कुमार


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