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मेरे अल्फाज़

बारिश का मौसम और उसकी याद

Vikash Beniwal

95 कविताएं

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आज पुन:पुन: उसकी याद आने लगी है
शायद वो भी मेरी यादें छुपाने लगी है,
ये बारिश की बुन्दे भी यार
यूँ नाच-नाचकर मुझको सताने लगी है।

आज दुबारा उसकी याद आने लगी है
धरा भी नभ को गले लगाने लगी है,
मैं अकेला नर्वस बैठा हूँ
प्रकृति भी मन्द-सी मुस्कुराने लगी है।

आज अचानक उसकी याद आने लगी है
ये मोसमी घटाएं आशिकी जगाने लगी है,
बुँदे न गिरती मेरी छत पर
मालूम हुआ कि ये मुझसे शर्माने लगी है।

आज तो मुझे उसकी याद आने लगी है
वो भी उम्मीदे-ए-प्रेम गीत गाने लगी है,
दर्द भी उभर आया पुराना
जो यादें ताज़ा थी सो अब डराने लगी है।

आज फिर उसकी याद आने लगी है
हवाएं सुरम्य संगीत गुनगुनाने लगी है,
उसकी यादों में भिड़ मची
यादें भी मुझसे यादें लिखवाने लगी है।

-विकाश बैनीवाल
जाट(भादरा)


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