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मेरे अल्फाज़

मेहनतकश लोगों के नाम

Vikas Rai

2 कविताएं

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जिसके हाड़ मांस ने दिया है दुनिया को ठोसपन,
जिसके पसीने से तरल है ये दुनिया,
जिसकी धमनियों और शिराओं से होकर बहता है
दुनिया में रक्त।
जिसके फेफड़ों से बनी हुई है, हवा की आवा-जाही,
जिसके हृदय में बसते हैं दुनिया के प्राण।

हाँ वही, जो अनवरत खड़ा रहा सदियों से,
उसकी हड्डियाँ छीज रहीं हैं अब।
तुम्हारे उर्वरकों का यूरिया, ले रहा है उसके पसीने की जगह।
तुम्हारे गंदे नाले का पानी रिस रहा है
उसकी नसों में।
उसके फेफड़ों में जमा हो रहा है तुम्हारी फ़ैक्ट्रियों का धुआँ।

सुनो! तुम्हें मेरी बात का यकीन हो,
उससे पहले ही
वो जो अनवरत खड़ा था,
वो बैठ जाएगा धम्म से।
तुम्हारी दुनिया रुक जाएगी एकदम,
क्यूंकि,

उसके हाड़-मांस से,
उसके पसीने से,
उसकी धमनियों, शिराओं से
उसके फेफड़ों से
चल रही थी तुम्हारी दुनिया
उसके हृदय में धड़क रहे थे तुम


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