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मेरे अल्फाज़

प्रथाएं

vikas jaiswal

3 कविताएं

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परम्पराएं तो हैं अपनी पहचान सखी,
जब तक करे ये अपना सम्मान सखी,
जब करे ये आत्मसम्मान पर प्रहार सखी,
तो मिल करना है इसमें सुधार सखी।

कोई भी कितना नकेल लगाये हम पर,
पर इसका परिष्कार जरुरी है,
नर- नारी सब रहे खुशहाल हरदम,
हर प्रथाओं में समान अधिकार जरुरी है।

जब जब प्रथाएं रूढ़ हुईं,
नारी ही इसकी भेट चढ़ी,
सती प्रथा हो या दहेज़ प्रथा ,
नारी की ही व्यथा कथा ।

क्यों न हो ऐसा ?
ऐसा तो होना ही था,
पग-पग परअंकुश होता है,
जहाँ पुरुष इसके नियंता है ।

गलत प्रथा का वो विरोथ करे,
तो परंपरा तोड़ने की दोषी हो,
वो परम्परा व्यर्थ हुआ,
जिसमें नारी ही पिसी जाती है ।

नारी ही अग्नि परीक्षा दे,
पुरुषों को स्वच्छन्दता का अधिकार मिला ,
ऐसी परम्पराएं घातक हैं,
जिसमें नारियों को अपमान मिला।

ऐसे प्रथाओं पर धिक्कार सखी,
जहां मिले न हमें अधिकार सखी।

पारस नाथ जायसवाल 'सरल'

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