कभी जिनमे थी छमता बहुत वही आज खुद से हारते

Kabhi jinke thi chhmta bahut vahi aaj khud se harte
                
                                                             
                            व्यथित मन कातर नयन
                                                                     
                            
चारों तरफ हैं निहारते।

कभी जिनमें थी छमता बहुत
वही आज खुद से हारते।

कभी मान था सम्मान था
जीवन का एक पहचान था।

काया तो जर्जर हो चली
न जाने जाना किस गली।

असहाय सा हर पल लगे
जीना बहुत मुश्किल लगे।

मन की कोई गहरी छवि को
आँखों से भी हैं बिसारते।

कभी जिनमें थी छमता बहुत
वही आज खुद से हारते।

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3 years ago

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