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Belive in motherhud

मेरे अल्फाज़

विश्वास

Vijay laxmi

3 कविताएं

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देख गोरिया गलियारे में
मन में उपजी जिज्ञासा,
तिनका-तिनका चुनती देखी
जब मैंने, भोली अभिलाषा,
जोड़-जोड़ सपनों के ताने
बुनती थी वो स्वपनाशा।
पूछ लिया उससे ही
क्यों ,दिन-रैन गंवाती है ?
इतनी मेहनत करती है
इतना जी खपाती है,
बार-बार उठती गिरती है
फिर झट से जुट जाती है,
बता सखी,तू किसके कारण
इतना कष्ट उठाती है,
मुस्काई पहले,फिर बोली
अपना धर्म निभाती हूँ,
जिस बालक को दुनिया में लाना
उसका नीड़ सजाती हूँ।
मैं बोली,री बावली !
एक दिन वो उड़ जाएगा,
छोड़ यहाँ वो तुझे अकेली
दुनिया नई बसाएगा,
रह पाएगी तू भी कब तक
काल तुझे डराएगा,
करे पुकार या दे दुहाई
वो क्या लौटकर आएगा ?
गूंजी अल्हड़-सी उस पल
प्यारी मोहक एक मुस्कान,
बोली वो मैं एक माँ हूँ
बात मेरी सुन धरकर ध्यान,
भले भुला देगा मुझको वो
चाहे छोड़कर जाएगा,
उस पल याद आऊंगी उसको
वो जब अपना नीड़ बनाएगा,
ममता मेरी उपजेगी उसमें
राह मेरी अपनाएगा,
धन्य तब हो जाऊंगी मैं
पीर अपनी भुलाऊंगी मैं,
धरकर संस्कार मेरे ही
जब अपने बच्चों को पालेगा,
फिर से जी लूँगी मैं जीवन
वो फिर से मुझ को पा लेगा।
इसी आशा में जीती हूँ मैं
है मेरा विश्वास प्रबल,
सींची है प्रीत से धरती
फलेंगे उस पर मीठे ही फल।
हतप्रभ थी मैं उस पंछी की
भोली-सी अभिलाषा पर,
मानव होकर पाल रहे क्यों
हम इच्छाएं आज सबल,
नियत कर्म है धर्म नियत
फिर क्यों परमेश्वर पर,
मन मेरे विश्वास नहीं
परिणामों में उलझी साँसें,
क्यों कर्म से अपने आस नहीं।

-विजय लक्ष्मी जांगिड़ ‘विजया’
जयपुर

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