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Varanasi hadase par

मेरे अल्फाज़

वाराणसी हादसे पर

Vijay Kumar

6 कविताएं

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हम जां से गये।
तुम्हारी दिल्लगी ठहरी।
ज़हां क्या खरीदोगे?
जेहन में गरीबी ठहरी।
लाशें खेल हैं भाई,
मुयावजा ठगी ठहरी।
ये सबा झुलसाएंगी
भरी दुपहरी ठहरी।
कितने घर बर्बाद हुए
कैसी ये तिश्नगी ठहरी!
(उन सभी के नाम जिम्मेदारी जिनके नाम थी)

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