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मेरे अल्फाज़

थोड़ा तो प्यार कर

Vijai Pant

8 कविताएं

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मैं कब कहता हूँ
तू मुझ पर जां निसार कर
बस इतनी इल्तिजा है मेरी
थोडा तो प्यार कर
रहने दे बदगुमानी
खाने दे अभी धोखे और
ये फ़रेब, ये झूठ
बार बार कर
कुछ झिझक मिटेगी,
कुछ शोखियाँ आएँगी
ऐसे ही मेरे साथ मुलाकात
दो-चार कर
गैरों को क्यों सुनाता है
किस्से अपने
मेरे पास आ,
मुझे राजदार कर
मुझको गैर भी नहीं कहता
मुझको अपनाता भी नहीं
शिकायत करता हूँ
जब तुझसे
तो बस कहता है
थोडा इंतज़ार कर
काश मुहब्बत में आए
ऐसा भी मुकाम
खुद को मजबूर कर
मुझको लाचार कर

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