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मेरे अल्फाज़

क्या मोमबत्ती जलाना काफी है ?

Vijai Pant

60 कविताएं

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एक दशक गुजर गया है
फिर भी
कैसे भूलें उस मंज़र को
वो वहशीपन की हद
वो गोलियों की तड़तड़ाहट
हर तरफ चीत्कार
वो खून के धब्बे
धुआं और अँधेरा
मौत का नज़ारा
ऐसे में सोचता हूँ मैं
क्या मोमबत्ती जलाना काफी है?
मौत का
बाल भर के फासले से गुजर जाना
इसको छोड़ के
दूसरे को अपने आगोश में ले लेना
वो भयानक चार दिन
उन बुलंद इमारतों
के चप्पे-चप्पे में
मौत की आहट सुनना
डर और आतंक के साये में
उन लम्हों को जीना
कैसे भूलेंगे, कैसे भुला पाएंगे?
एक दशक हो गया
पर ज़ख्म तो अभी भी हरे हैं
ऐसे में सोचता हूँ मैं
क्या मोमबत्ती जलाना काफी है?
वो टीवी पर सजीव प्रसारण
टी आर पी के लिए
न्यूज़ चैनल्स की आपस में होड़
पूरे देश का दम साधे
उन दृष्यों को देखना
सब तरफ क्रोध और आक्रोश
मगर, बेबसी और लाचारी भी
लोगों का तिलमिला कर
कसमसा कर रह जाना
याद है ना आपको?
ऐसे में सोचता हूँ मैं
क्या मोमबत्ती जलाना काफी है?
वो गीदड़ भभकियां
नेताओं का गरज़ना
‘देश की अस्मत पर हमला
सीधा या परोक्ष युद्ध’
सरहद पार आतंकवादी ठिकानों को
नेस्तनाबूद कर देने की हुंकार
पडोसी देश को सबक सिखाने की बातें
ऐसे में सोचता हूँ मैं
क्या मोमबत्ती जलाना काफी है?
सिसकियाँ अभी भी सीने में दफ़न हैं
रुआंसे गले आज भी भर आते हैं
बिछड़े हैं जो यकायक
वो अब कहाँ आ पाएंगे
पूछो जरा उनसे
जिन्होंने देखा है, महसूस किया है, खोया है
उस मनहूस तारीख में
जिसे २६/११ के नाम से हम जानते हैं
ऐसे में सोचता हूँ मैं
क्या मोमबत्ती जलाना काफी है?

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