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मेरे अल्फाज़

सृजन

VIBHUTI MANGAL

1 कविता

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मैंने खुद अपनी तस्वीर बनायी है
ज्यादा मुश्किल ना थी यूं तो
कुछ अंतहीन कोशिशें अनवरत
और ये छटा निखर के आयी है ।

मैंने मांगी नहीं मदद कभी
खुद को उठाने की खातिर
फिर क्यूं झुकने लगी मैं
कि तेरे वादें सिर्फ हवाई हैं ।

तेरी दया की मोहताज नहीं मैं
मैंने खुद अपनी शक्ल बनायी है
मेरा चेहरा है ये, कठोर सही
मुझे सच्चाई समझ यही आयी है ।

मज़ाक न समझना ज़िद को मेरी
ताश से बिखर पड़ेंगे आडंबर सब
जो मैं अपनी छवि बनाने लगी
तो तुझे क्यूं बेचैनी आयी है ।

तेरी राह मैंने रोकी नहीं
मेरी मंज़िल तुझसे अलग है कहीं
यूं ना डर अभी से मुसाफिर
मेरी फितरत तुझे समझ नहीं आयी है ।

धूप – छांव के छींटें मार
मैंने तलवे अपने बांचे हैं
तेरे मन मकसद से दूर कहीं
मेरी सोच की गहराई है ।

तुझे बदल सकूं ना सकूं
इस बात से मुझे सरोकार नहीं
अपनी पहचान ना बदलने दूंगी मैं
ये बदलाव की अंगड़ाई है ।

मेरे नसीब की मुझे सुध नहीं
मैंने कर्मों की टिकाई है
जब डिगा सके इसे कोई
वो शाम अभी नहीं आयी है ।


लड़खड़ा के गिर पडूंगी मैं
इसमें कोई दोराय नहीं
मालूम था अकेली राह है मगर
मैंने ना थमने की कसम खाई है ।

ठहराव से कोई बैर नहीं मेरा
थिरकते पैर ज़रा पसंद हैं मुझे
ज़ेहन के हर हिस्से से आज
इबादत की नयी अदा कुलबुलाई है ।

वजह ना पूछ मेरी जंग की तू
अपनी ही शर्तों पर मुझे जीना है
इक यही आदत बनी मर्ज है कातिल
और मुझे इलाज की वजह नजर नहीं आयी है । 

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