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Maa ...

मेरे अल्फाज़

माँ...

Vibhanshu Bhashkar

18 कविताएं

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शायद हम वो ना रहे या जज्बात बदल गए है
इस जिंदगी के हालात या ख्यालात बदल गए है

तुझसे मिलने के लिए समय तलाशना पड़ता है
जब पढ़ाई के लिए तुझसे दूर जाना पड़ता है

देर से मिले खाने से होता था अक्सर नाराज
अब जली रोटी भी खुश होकर खाना पड़ता है

ना शर्माता हु ना इठलाता हु ना घबराता हूं
समझौता कर जिंदगी से,आगे बढ़ता जाता हूं

अब भी नाराज होने के बहाने तो मै ढूढ़ लेता हूं
पर तुझे पास ना पाकर आंसुओ से लड़ लेता हूं

शायद अब मेरे दर्द के हिस्सेदार बदल गए है
या यो कहे मेरे कहानी के किरदार बदल गए है

पहले जैसे अब बुखार से जब बदन है फटता
तुझे याद कर पूरी रातें रहता हु करवटे बदलता

तेरी लोरी का अब मैं इंतजार नहीं करता हूं
खुद ही गुनगुना कर खुद को सुला लेता हूं

अब गंदे कपडे,फटे जूते भी पहनना सीख गया हूं
कमियों साथ खुश रहने का हुनर भी सिख गया हूं

ये सारी समझदारीया फिर से भूलना चाहता हूं
उस गोदी उस बचपन को फिर से जीना चाहता हूं

आज तो मै अक्सर हसकर दर्द छिपा लेता हूं
पर माँ के सामन जाते ही ये हुनर भूल जाता हूं

गर्मी की छुट्टी भी घर मे तेरेें साथ बिताना चाहता हूं
शिमला,ऊटी,नैनीताल ये सब भूल जाना चाहता हूं

विभांशु भास्कर
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