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मेरे अल्फाज़

स्मृति बुला रही हो मानों

Vandana Agrawal

32 कविताएं

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सुनसान सी वह सड़क जो
पड़ती थी कालेज जाते समय
जगह-जगह से फटी औ'
कहीं-कहीं पर चिथड़ों को
टांका गया हो मानों

साइकिल के पहिये
पृथ्वी की धुरियों की भांति
घूमते-घूमते अपनी जिद में
उस पैबंद लगी सड़क पर
संभलते-संभलते बढ़े जा रहे हो मानों

औ' वह हरसिंगार का पेड़
फूलों को जमीं पे बिखेरता,
झड़ता, खुश्बू फैलाता रुकने के लिए
आवाज लगा रहा हो मानों

पर दूर खड़ी तुम्हारी स्मृति
मुस्कुराती हुई बुला रही हो मानों..

-- वंदना अग्रवाल निराली

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