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मेरे अल्फाज़

प्रकृति खामोश थी

Vandana Agrawal

36 कविताएं

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सड़क अमानवीय हिंसा के
कीचड़ से सनी थी
जगह-जगह उबड़-खाबड़
विचारों के गढ्ढो में छल के
बरसात का पानी रुका हुआ था

शहर हैवानियत के शोर
से काफी व्यस्त था
नैतिकता आलमारी में रखे
किताब के पन्नों में
घुटन महसूस कर रही थी

औ' बादल की आंखों से
आंसू की इक बूंद ही गिरी थी
जिसने उस नन्हें पत्ते को
सजीव कर दिया था जो
वृक्ष की टहनियों से चिपका
पीले होते पत्तों में
अस्तित्व ढूंढ रहा था
प्रकृति खामोश थी..

--वंदना अग्रवाल 'निराली'

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