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मेरे अल्फाज़

बादलों में कोई घर अपना होता

Vandana Agrawal

30 कविताएं

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बादलों में गर
कोई घर अपना होता
बंधनों में ना फिर
ये तन बंधा होता
सैर हवाओं में करती
पंछी बन नभ में विचरती
शांत शांत सा हर कोना होता
न मन मेरा किसी
के लिए खिलौना होता
बादलों में गर
कोई घर अपना होता

रंगों को ना फिर
ये नयन तरसते
हर भाव को
एक ही रंग जीते
न अपना न कोई बेगाना होता
मन तो सिर्फ
खुद का दीवाना रहता
शोर - शराबों से दूर
इक जहां होता
बादलों में गर
कोई घर अपना होता..

- वंदना अग्रवाल निराली

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