मोहब्बत और मजहब

Mohabat vs Majhab
                
                                                             
                            अम्बर सा आडम्बर क्यों
                                                                     
                            
बारिश की फुहार मोहब्बत

क्षितिज सी कोरी कल्पना क्यों
शास्वत सत्य का प्रमाण मोहब्बत

फैला यूं कोलाहल क्यों
है अंतरिक्ष सी शान्त मोहब्बत

उसको बस में करना क्यों है
सागर सी अपार मोहब्बत

मुद्दों पे जग क़तर क्यों
धरती सी उदार मोहब्बत

जैसी है स्वीकार नहीं हैं
भेद भाव से पार मोहब्बत

उसका फ़िर कोई मज़हब क्यों हो
हर मज़हब का सार मोहब्बत

- वैभव

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
 
3 years ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
X