आपका शहर Close
Home ›   Kavya ›   Mere Alfaz ›   Aankhe bhar aati hai sham hote hi

मेरे अल्फाज़

आँखे भर आती हैं शाम होते ही

Updesh vidyarthi

5 कविताएं

1088 Views
दाना चुंगने कोई कितना ही दूर गये
सारे पंछी लौट पड़े अपने घर शाम होते ही

शहर की पों पों पो से ऊब चुका हूँ मैं
गांव की याद सताने लगती है शाम होते ही

चिडियो की चूँ चूँ का वो मधुर संगीत
सुनने को दिल करता है शाम होते ही

चौमासे की पहली बारिस पे याद आया
कैसे सिकुड़ जाता था चकौड़ा शाम होते ही

लौटते चिडियो की बड़ी उड़ानें,
देखना कितना अच्छा लगता था
आसमाँ का वो हसींन नजारा
याद आ जाता है शाम होते ही

बस कुछ फूलो के गुलदस्ते से
लोग यहाँ कितना ख़ुश हो जाते हैं
अपने फूलो की वो बगिया
याद आ जाती है शाम होते ही

गांव का अपना बड़ा अहाता याद आ जाता है
जब कोई दो कमरों को घर कहता है शाम होते ही

आज के बच्चे मोबाइल से बाहर निकले तो जानें
लुका छुपी में कितना लुत्फ़ उठाते थे शाम होते ही

आई लव यू कह देने को
लोग यहाँ पर प्यार समझते हैं
पर असली प्यार किसे कहते हैं
लोग कहाँ समझते हैं

सारे काम के बाद खेल खेलने वो आयी
उस चिड़िया से चोंच लड़ना कितना अच्छा लगता था
हर बात पे चूं चूं चीं ची करती चिढ़ जाती थी
इसी लिए तो उसे चिड़ाना अच्छा लगता था

आज पहाड़ा सुनने की बेला थी
मास्टर जी ने हमको पीट दिया
तब उसका मास्टर जी से लड़ जाना
सब कुछ याद आ जाता है शाम होते ही
कुछ यादो से एहसासो से
आँखे भर आती हैं शाम होते ही

-updesh vidyarhi


हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
 
सर्वाधिक पढ़े गए
Top
Your Story has been saved!