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मेरे अल्फाज़

उम्मीद की कतरन

संतोष सिंह

39 कविताएं

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दबे कुचलों की समस्या अब सुलझनी ही चाहिए
जन जन की रायशुमारी को जगह मिलनी ही चाहिए
व्यवस्था की शैली तो अब बदलनी ही चाहिए
जनता की हिस्सेदारी अब तो बढ़नी ही चाहिए
समाज में एक पहल अब होनी ही चाहिए
घर घर से बेटियां अब तो पढ़नी ही चाहिए
गणतंत्र में हनक अब तो दिखनी भी चाहिए
राष्ट्र हित की बयार सघन बहनी ही चाहिए
किसानों तक हर मदद पहुंचनी ही चाहिए
भ्रष्टता की बीमारी खत्म होनी ही चाहिए
रोजगार की ऐसी धारा निकलनी ही चाहिए
हर कोण से बेकारी घटनी भी चाहिए
मतवाली चांदनी अब छटनी ही चाहिए
तरूणाई की उम्मीद अम्बर छूनी ही चाहिए
सूरज से किरण अब फूटनी भी चाहिए
धरा पर छटा अब बिखरनी भी चाहिए
कमलों से सुगंध अब उठनी भी चाहिए
संग हवाओं के वो अब पसरनी भी चाहिए
दिल में छुपी हसरतें अब उफननी भी चाहिए
ओंठो पे आ रूकी मुस्कान तो बिखरनी भी चाहिए

क्षात्र_लेखनी

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