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मेरे अल्फाज़

हुई इसे सियासत की एक भारी चूक लिखूंगा

Umair Siddiqui

127 कविताएं

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उठ रही है जो देश में इसे मज़लूमों की हुक लिखूंगा
हुयी इसे सियासत की एक भारी चूक लिखूंगा
जल रहा है फिलवक्त मेरा देश एक बिला वजह सी लगी आग में
ताप रही है हाँथ सियासत हमारे जलते लहू की आग में
अभी का ही नहीं ये तरीक़ा तो बहुत पुराना है
बचाये रखनें को कुर्सी झोंका जाता है अवाम को आग में
हो रहे इन सियासी फैसलों को हिटलर मिजाज़ी से मंसूब लिखूंगा
हुयी इसे सियासत की एक भारी चूक लिखूंगा
चूसती है खून अवाम का सियासत क़िस्सा पुराना है
मगर बँट गयी है अवाम हिस्सों में ये बाब कुछ नया नया है
यार सियासत बेधरम सही हमें तो अपना धर्म निभाना है
याद रखो टूटी जो एकता अपनीं फिर तारीखे जर्मनीं को दोहराना है
मैं चीख चीख कर इस दर्द को कई बार लिखूंगा
हैं जो क़ातिल ऐ आइन उन्हें उन्हें देश का शख्स ऐ मरदूद लिखूंगा
हुयी इसे सियासत की एक भारी चूक लिखूंगा
हम सब हैं वो जिसे अवाम कहते हैं
हाँ हाँ वही जिनके दुःख सुख सांझे रहते हैं
जहॉं कोई करीम सीढ़ियां मंदिर की बनाता है
जहाँ वो राम कुमार भी फूंक छुड़वाने मस्जिद ही तो आता है
ऐसे आलम में टूटी हर मस्जिद का क़ातिल बस सियासत वालों को लिखूंगा
हुयी हर एक घटना की ज़िम्मेदार थी सियासत की गन्दी भूंक लिखूंगा
हुयी इसे सियासत की एक भारी चूक लिखूंगा
उमैर ये देश अपना आखिर किस जानिब बढ़ा जाता है
कौन हमें वो उन्नीस सौ सैंतालीस का सा मंज़र याद दिलाना चाहता है
और याद वो पड़ोसी मुल्क का एक दौर भी आया चाहता है
हबीबो जालिब से खुद को और नेताजी को जर्नल अय्यूब से मरऊब लिखूंगा
और हाँ बड़े अफ़सोस के साथ मैं कुछ मुट्ठी भर लोगों को मुर्ख लिखूंगा
सियासत की हुयी इसे एक भारी चूक लिखूंगा
Umair Siddiqui
husain ganj lucknow


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