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मेरे अल्फाज़

सड़क दुर्घटना में...

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जिसने मृत्यु से खेलकर तुमको जाया,
निज लहू पिला जिसने पाला,
निज जीवन जिसने जोड़ा तुमसे,
अपना जीवन घोला तुममें,
उस गोदी के वृत्तपुष्प को,
यूं तुम्हें सुखाने का कोई अधिकार नहीं है,
सोंच,समझकर,रुककर निकलो, सड़क दुर्घटना में,
निज जीवन दांव लगाने का यूं तुम्हें कोई अधिकार नहीं है...।

निज लहू जला जिसने पाला,
निज स्वाभिमान तुमको माना,
जिसने खुद को तुम्हारी ढाल बनाया,
जिसने तुम्हारे रोदन पर सर्वस्व लुटाया,
उस पितृ के सहारे को, उजियारे को,
यूं तुम्हें छीनने का कोई अधिकार नहीं है।
सोच,समझकर, रुककर चलना, सड़क दुर्घटना में,
निज जीवन दांव लगाने का यूं तुम्हें कोई अधिकार नहीं है...।

श्रावणी के आलौकिक सूत्र से जिसने,
निज विश्वास का आकाश बनाया है तुमको,
निज आस्था का अनुपम आधार बनाया है तुमको,
जिसने लड़कर, झड़कर स्नेह का कोष लुटाया है तुम पर,
उस बहन के सावन को ,
यूं पतझड़ बनाने का तुम्हें कोई अधिकार नहीं है,
सोच, समझकर, रुककर चलना, सड़क दुर्घटना में,
निज जीवन दांव लगाने का तुम्हें कोई अधिकार नहीं है..

सामने जाता राहगीर भी,
किसी व्रती के व्रत का फलित है,
किसी का विश्वास, किसी का सहारा,
या किन्हीं आँखों का तारा है,
अतः खुद की पशुता से,
किसी का उपवन उजाड़ने का यूं तुम्हें कोई अधिकार नहीं है,
सोंच,समझकर,रुककर चलना, सड़क दुर्घटना में,
निज जीवन दांव लगाने का यूं तुम्हें कोई अधिकार नहीं है...।

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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