तुम भगवन मैं दासी तुम्हारी

                
                                                             
                            तुम भगवन् मैं दासी तुम्हारी,
                                                                     
                            
तुम गुरु मैं शिष्य अज्ञानी,
तुम ज्योति मैं नयन मुस्कानी,
तुम भेद मैं महिमा बखानी,
तुम श्वांस मैं देह माटी,
तुम सुधा मैं जन-जन बाटी,
तुम लक्ष्य मैं मोह काटी,
तुम अनमोल मैं कण-कण बाची,

तुम शक्ति मैं हाथ राखी,
तुम भक्ति मैं हृदय साजी,
तुम संगीत मैं मुख गायी,
तुम ताल मैं झूम नाची,
तुम कर्म मैं दृढ़ स्वीकारी,
तुम धर्म मैं मस्तक धारी,
तुम फल मैं परिश्रम प्यारी,
तुम सुरभि मैं अंतर् उतारी,

तुम विश्वास मैं प्रीति डारी,
तुम चेतन मैं सर्व बिसारी,
तुम ब्रह्मांड मैं कुंभ खाली,
तुम प्रयास मैं पूर्ण आकांक्षी,
तुम प्रतियोगिता मैं भाग प्रतिभागी,
तुम विलुप्त मैं दरस अभिलाषी,
तुम प्यास मैं चरण प्यासी,
तुम सर्वेश्वर मैं यति अभागी...!!

- सृष्टि "वसु" (जग से बांवरी)


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8 months ago
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