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मेरे अल्फाज़

व्याकुल धरा

Trishika Srivastava

4 कविताएं

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बता ना सके, जता ना सके
हृदय की पीर मिटा ना सके
भीतर-भीतर सिसक रही
नयनो से नीर बहा ना सके
युगों-युगों से प्रेम को तरसे
प्रेम की तृषा बुझा ना सके
विरह की धूप में जलती रही
छांव मिलन की पा ना सके
व्याकुल-व्याकुल रहे "धरा"
अम्बर के समीप जा ना सके

--- त्रिशिका श्रीवास्तव "धरा"
कानपुर (उ.प्र.)


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