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मेरे अल्फाज़

पत्थर सा बदनाम हो गया हूँ

The Sachin

17 कविताएं

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पत्थर सा बदनाम हो गया हूँ
1. मेरे ही शहर में पत्थर सा बदनाम
हो गया हूँ शीशा कहीं भी टूटे नाम
मेरा ही आता है
हूँ कुछ भी नहीं, बदनाम सरेआम हो
गया हूँ मनमर्ज़ी की धूप हूँ तो कभी
सर्दी की शाम हो गया हूँ
पत्थर सा हूँ यहाँ से वहां गिरता रहता हूँ
जरूरत के वक्त हर किसी के घर की
छाँव हो गया हूँ
बेकार ही तो हूँ कहाँ काम आने वाला
मेरे कारण किसी को चोट लगे कहाँ
रुलाने वाला, छोटी सी तो कहानी हूँ
जो आम हो गया हूँ
मेरे ही शहर में पत्थर सा बदनाम हो गया हूँ
शीशा जहाँ भी टूटे, नाम मेरा ही आता है

 Sachin Kumar


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