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मेरे अल्फाज़

वैसा नहीं रहा

Thakur Vishal

7 कविताएं

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सख्त था मैं सख्त मिजाज़ था
अब वक़्त वैसा नहीं रहा

नरमी है अब मेरे लहज़े में
अब मैं पहले जैसा नहीं रहा

चर्चे थे कभी मेरे भी तेरी तरह
वक़्त अब मै तेरे जैसा नहीं रहा

मिट चुकी है चेहरे से लाली
अब चमड़ी सिकुड़ने लगी है

कुछ दूर है पड़ाव झुर्रियों का
देख अब जहन में पैसा नहीं रहा

ठाकुर विशाल 


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