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तेरी खुशबू कहां है जूही?

TERI KHUSHBU KHAN HAI JUHI
                
                                                                                 
                            मैं तो पूछ रहा था यूंही,
                                                                                                

तेरी खुशुबू कहां है जूही।
क्यों तू है इतनी अलसाई
खिलने से पहले मुरझाई।।

सोलह साल व्यतीत हो गए,
तुझमें एक कली ना आई।
यूं निर्लज खड़ी कैसे हैं,
इसीलिए क्या तू थी लगाई।।

"महकेगी तू" यह उम्मीद थी,
इसीलिए थी गोली खाई।
तेरी खुशबू की आशा में,
जेल गये,लाठी भी खाई।।

कितनों ने संघर्ष किया था
कितनों ने थी जान गंवाई।
याद तो होगा ही ना जूही
कितनी थी कठिनाई आई।।

माली आठ दिए फिर तुझको,
क्यों अब तक तू महक ना पाई।
अरे! कबतक तेरे फूल खिलेंगे,
बोल तो जूही,क्यों इतराई।।

मैं अब तक बस पूछ रहा था
पर जूही थी,मौन खड़ी।
पर वो सब्र कहां तक करती,
गुस्से में फिर बोल पड़ी।।

हां! संघर्ष किया था सबने
जेल गए,लाठी भी खाई।
महकूंगी मैं,यही सोचकर,
लोग ने निज जान गंवाई।।

माली आठ दिए जो मुझको,
हैं वो कौन पता है भाई।
काम तू उनका देख न पाया,
क्यों तेरी आखें धुंधलाई।।

जिनको तू माली कहता है,
उनको क्यों तू जान न पाया।
धुंधली आंखों से तू शायद,
उन सबकों पहचान न पाया।।

जो मेरे भक्षक थे उनको,
रक्षक मेरा बना डाला।
पानी की वो बूंद न दे सके,
पत्तों को भी जला डाला।।

सबने अपनी-अपनी सोची
मुझको तो सब भूल गये।
मेरे रस को चूस-चूस,
आराम के झूले झूल गये।।

सींचा गया आग से मुझको,
कैसे फूल खिला दूं मैं।
लूट लिया जब मुझको तो,
ख़ुशबू कैसे बिखरा दूं मैं।।

मुझको तो निर्लज्ज कह रहे,
क्या तुझमें कुछ लाज बची है।
मेरी बर्बादी की साजिश,
तुम सबने ही मिल के रची है।।

आंसू एक गिरा जूही का,
मेरी भी आंखे भर आई।
दोनों ही नि:शब्द हो गए,
और निराशा मन में छाई।।

मांफ मुझे कर देना जूही,
मैं तो पूछ रहा था यूंही।
पर यह वादा तुझसे है कि,
जल्दी महकेगी तू जूही।।

हम सब मिल यह काम करेंगे,
सच्चा रक्षक तुझको देंगे।
होगी इतनी खुशबू तुझमें,
जन-मन आह्लादित होंगे।।

फिरसे मैं पूछूंगा यूं ही,
इतनी ख़ुशबू कहां से जूही।
बस हंस देना,इतना कहना,
अब तो महकूंगी मैं यूंही।।

महेश भट्ट

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1 month ago

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