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मेरे अल्फाज़

ग़ीतिका : हादसों में ...

Tejpal Singh

175 कविताएं

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हादसों में आसरा पाऊँ कहाँ,
प्रेम की परछाइयाँ पाऊँ कहाँ।

मौत मुँह खोले खड़ी है चारसू,
जिन्दगानी का पता पाऊं कहाँ।

हो गया हर सिम्त अब शहरीकरण,
शहर अपने गाँव सा पाऊँ कहाँ।

ओस में लिपटे चमन की ताज़गी,
बानबाँ कुछ तो बता पाऊँ कहाँ।

हैं बुलबुलों के पंख वन्दनवार में,
शहर में अब तितलियाँ पाऊँ कहाँ।

चूडियाँ शबभर खनक के रह गईं,
हौंसले अब या-खुदा पाऊँ कहाँ।

जो असल चेहरे को नुमायाँ करदे,
‘तेज’ ऐसा आईना पाऊँ कहाँ।
-तेजपाल सिंह ‘तेज’


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