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मेरे अल्फाज़

तुम सावन हो जाते

Tariq Ali

14 कविताएं

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काश तुम ऐसा कर पाते
मरुस्थल में नीर बरसाते
मैं ना होती जेष्ठ आषाढ़
जो तुम सावन हो जाते

मन पर मेरे इतने छाते
फिर भी ना मिह बरसाते
ताल तलैय्या सब भर जाते
जो तुम सावन हो जाते

मेघा आते मेघा जाते
केवल साया ही कर पाते
तृप्ति तो हम तब पाते
जो तुम सावन हो जाते

माना के तुम अश्रु बहाते
मन को मेरे आभास कराते
जो तुम चाहते वो पाते
जो तुम सावन हो जाते

भू आँचल में आशा भरते
अंकुर में नव जीवन धरते
वंध्या धरती की गोद सजाते
जो तुम सावन हो जाते

उनको निष्ठुर कहते कहते
जी लेंगे दुख सहते सहते
मन को फिर भी वही है भाते
काश वो सावन हो जाते

डॉ तारिक़ अली


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