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मेरे अल्फाज़

मैं हूँ नारी, हूँ मैं जननी , नहीं अबला ! क्यों सबको जताना पड़ता है !!

Sushil Kumar

26 कविताएं

11 Views
१. कभी न चाह कर भी , सिर को झुकना पड़ता है !
अपने सम्मान के लिए, स्वयं को उठाना पड़ता है !!
2. मैं बेबस हो गयी हूँ , यह ग़लतफहमी न पाल ए दोस्त !
.कभी वज़ूद के लिए ,असली चेहरा छुपाना पड़ता है !!
३. मैं हूँ नारी, हूँ मैं जननी , नहीं अबला !
क्यों सबको जताना पड़ता है !!.


रचयिता : आकांक्षा जैन ' शौर्या जैन '

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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