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मेरे अल्फाज़

भारत माँ के बहादुर बेटे

Susheel Sharma

9 कविताएं

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बांध तिरंगा सिर पे लाडले,जब सीमा पे जाते हैं
सिंहनाद सुनके शत्रुदल,भयकम्पित हो जाते हैं
जितने सौम्य मतवाले दिखते,रणचंडी के लाल है वो,
नेत्र तीसरा मत छेड़ो तुम, साधक नहीं महाकाल है वो।
आज गालवान गवाही दे रहा, दुश्मन के विश्वासघातों का,
वो हाईलेवल द्विपक्ष वार्ता, उन चिकनी चुपड़ी बातों का।
जहां शेरों की मांद हो वहां, कुत्ते कबसे जाने लगे,
शियार शेर नहीं बन सकता, जी चाहे गुर्राने लगें।
बिल्ली के नाखून बढ़ जाने से, वो शेर बनी ये सुना नहीं
देख शत्रु को रास्ता बदले, हो सैनिक ऐसा सुना नहीं।
बाँसठ का भारत होगा अब भी, ये वहम हुआ है तुम्हें सुनो
युद्ध-बुद्ध दोनों खड़े सामने, जिसे चाहें उसे चुनो।
पिनाक लिए वहां शिव खड़े हैं, सियाचिन की घाटी पे
मां तनोट का आँचल उनपे, जैसलमेर की माटी पे

सुशील शर्मा
तारानगर


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