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मेरे अल्फाज़

मेरा हौसला हैं वो

susheel baghel

108 कविताएं

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जब भी मैं टूटता हूं
हारता हूं इस जहां में
उसकी मुस्कान देती सहारा
बन जादू देती हौसला
करती बुलन्द फिर मुझे
पाने को मेरा लक्ष्य करती खड़ा

है कौन वो मेरी जो
करती मुझे बुलन्द
देती क्यों जज्बा
ना जानू मैं ना जाने वो

है बहुत प्यारी लगती परी
जिनती सुंदर वो उतनी खरी
मासूम चाहत सुंदर सी सीरत
नियत और नीयति मे बस वो ही वो

किया मुझे बुलन्द मेरे हर कदम पर
दिया हौसला मेरे हर लड़खड़ाते कदम पर
चलता हूं मैं पर बढ़ती वो मेरे हर कदम पर
मंजिल है मेरी पर पहुंचाने की ललक उसकी हर कदम पर

फिर भी जुदा है मुझसे मेरे हर फैसले पर
जाने क्यूं खफा है मुझसे मेरे हर कदम पर
चाहती हैं क्या ना जान पाया मैं कभी उससे
बस है तैयार खड़ी मेरे हर राह हर कदम पर

-सुशील अनजान

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