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मेरे अल्फाज़

सरसों का फूल

suryakant nirala

28 कविताएं

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वो झूमता... वो लहराता
जो उसे ढहर के देखे,
बस देखते रह जाता
जो साथ मे ना हो, उसकी याद दिलाता ।

वो मिट्टी की खूशबू, वो खलिहान
वो खलिहान में बैठी दादी मां,
वो गांव का याद दिलाता, वो यादें बहुत सताता,
मैं कैसे जाऊं भूल? वो खेत कि मिट्टी सरसों का फूल।

कभी धूप का आना कभी जाना
घर अनाजों से भरा, होली का गीत गाना
स्कूल से आते खेतों में साग खाना,
घर आते ही खेलने भाग जाना,
खेल के देरी से आना,
घर में चुपके से जाना,
मां के आंचल में छुप के
पिता का डांट खाना,
पढ़ते समय सोने का बहाना
मां के कहने पर हो गई तेरी पढ़ाई
पहले खालो खाना फिर सो जाना।
मैं हूं गांव का कैसे जाऊं ये सब कुछ भूल ?
वो मिट्टी की खुशबू वो सरसों का फूल ।।

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