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मेरे अल्फाज़

राम मन्दिर बना लीजिए

Surjit man

14 कविताएं

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ये भी क्या कम हुआ फैसला आ गया।
लीजिए राम मन्दिर बना लीजिए।

प्रेम के तत्व में नेह अमरत्व में।
भूल जाइए हिन्दू मुसलमान को।
धर्म पर धर्म का व्याकरण ना गढ़ो।
राम को ना झगड़िये न रहमान को।
मैं भी दरगाह जाकर करूँ आरती।
पूज कर राम को तुम खुदा कीजिए।
ये भी क्या कम हुआ फैसला आ गया।
लीजिए राम मन्दिर बना लीजिए।

बात बढ़ने लगे बात से बात पर।
अब बहकना नहीं है किसी बात पर।
धैर्य से काम लेना है मिलकर हमें।
काबू पाना है नफ़रत के हालात पर।
जीत का हार का प्रश्न है ही नहीं।
मिलके अब तो दुआ से दुआ कीजिए।
ये भी क्या कम हुआ फैसला आ गया।
लीजिए राम मन्दिर बना लीजिए।

हम अमन का ये सन्देश दें विश्व को।
काबा काशी में कोई भी अन्तर नहीं।
हमने रमज़ान नवरात संग संग रखे।
ईद होली में कोई भी अन्तर नहीं।
चाहतों की महक से जो लबरेज़ है।
उस हवा को गले से लगा लीजिए।
ये भी क्या कम हुआ फैसला आ गया।
लीजिए राम मन्दिर बना लीजिए।

सुरजीत मान जलईया सिंह



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