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मेरे अल्फाज़

ब्रजधाम

Surjit man

15 कविताएं

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वृषुभान लली तेरी जै जै हो वत कान्हा भी तेरे द्वार खड्यौ है
तीन हुं लोक नचै जाकै नाचै हैं राधा के संग में वो हू नच्यौ है
प्रेम कै पंथ पै ऐसौ लुटियौ है कि देखौ तौ शीश नबायै खड्यौ है
धन्य भयी बज्र की रज मेरी तौ देखौ यहां गिरिराज खड्यौ है

काहै कूं ज्ञान की बात करै हौ काहै कूं ऊधौ ये हीय जलावत 
जा बज्र में बस प्रेम बसियौ है कोई ना ज्ञान कौ दीप जलावत 
बांसुरी वादक प्रेम प्रणेता वो नन्द कौ लाल तौ हीय समावत 
राधा के रूप में कान्हा जो देखे तौ ऊधौ गये आज स्वयं लजावत 

- सुरजीत मान जलईया सिंह

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