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मेरे अल्फाज़

हमेशा की तरह

surinder kaur

24 कविताएं

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हमेशा की तरह आज वो फिर उदास था।
दूर बहुत निकल गया , जो बैठा पास था।
एहसास के काँटे मुझे भी चुभ रहे होंगे,
सोच रहा था शख्स,जो मेरा दर्द शानास था।

हँस हँस के जो बातें कर रहा है तिश्नगी की
भूल गया कभी वो मेरे लबों की प्यास था।
सूखा गुलाब हाथ मे पकङ के वो था बोला
महका हुआ चमन कभी, मेरे भी पास था।

अजनबी बन कर जो महफिल मे बैठा है,
मेरे दोस्तों में कभी वो शख्स खास था।
अफ़साने क्या क्या सुनाये ,रंजो ग़म के अब
इतना समझिये वो जीवन की आस था।
सुरिंदर कौर


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