फेरीवाला

                
                                                             
                            एक फेरीवाला अपने फेरी के साथ,
                                                                     
                            
शारीरिक रूप से था वह बीमार,
उस पर से उसकी लड़खड़ाती चाल,
मैं तब हुआ ज़रा हैरान
और पूछा क्यों आए हो आज बाजार,
क्या तुम्हें पता नहीं तुम्हें है तेज बुखार

उसने फिर धीरे से मुंह खोला बोल ना पा रहा था फिर भी बोला।
मुझे तो सिर्फ तेज बुखार है,
मेरा बेटा हुआ डेंगू का शिकार है,
अब मैं आगे क्या बोलूं अपने दुख का भेद क्या खोलूं
सगे-संबंधी भी साथ छोड़ गए हैं
हिम्मत रूपी कमर तोड़ गए हैं
अब फेरी ही हमारा सहारा है
बस हमारे साथ अब कर्म हमारा है

सुनकर उस फेरीवाले की बात 
सोचा मदद उसकी करुं एक बार
पर कैसे धन रूपी सागर मेरे पास न था 
आज फिर सूरज सोचने पर मजबूर हुआ।
दुनिया इतनी मुश्किल क्यों है,
जिसे धन की जरूरत है वह निर्धन क्यों है।
क्या भगवान भी अमीरों के पास सो गए हैं ,
क्या भारत जैसे बड़े देश में।
भगवान गरीबों का पता भूल गए हैं,

मेरा दिल तड़प रहा था,
खुद को बहुत बेबस समझ रहा था,
उसका दर्द मेरा होकर रह गया ,
और मदद ना कर पाने का मलाल मेरे संग रह गया।

- सूरज

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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3 years ago

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