आपका शहर Close
Home ›   Kavya ›   Mere Alfaz ›   Budha pedh
Budha pedh

मेरे अल्फाज़

हमारे पाठक सूरज चौधरी बता रहे हैं 'बूढ़े पेड़' का दर्द

suraj chaudhary

14 कविताएं

118 Views
मन से सींचा,जिस पेड़ को,
पेड़ वो,आज मुरझा रहा।
ये देख बगल में,एक पेड़
मंद-मंद मुस्करा रहा॥

व्यथा गजब थी पेड़ की,
मन में द्रवित था बड़ा।
अब चलने, फिरने,बोलने
के ,लायक नही, था बचा॥

मन्नतें थी, बहुत
जन्नतों को पाने की।
पर राह,आसान नही थी,
वहाँ तक जाने की॥

कोशिशों के कयास लगाए गये,
सारे सगे-सम्बन्धी बुलाए गये।
चर्चा इसी बात की दोहराई ,
जिसकी थी, बचपन से लड़ाई ॥

बूढ़े पेड़ की यही कहानी,
इसी बात पर, हंसते थे प्राणी।
जिसका समय वही ही जाने,
कैसे बीता वह लगा सुनाने॥

जब मै छोटा बच्चा था तो,
प्यार, बड़ा मिला करता था।
कोई प्यार से गोलू- मोलू,
कोई छोटू कहा करता था॥

धीरे-धीरे बड़ा हुआ तो,
कोई-कोई प्यार करा करता था।
जिंदा-दिल जिदंगी पर,
कभी-कभी कोई मरा करता था॥

और बड़ा हुआ तो आगे,
प्यार, मौसमी हुआ करता था।
जब फल लेना होता था, तब ही
द्रव मिला करता था॥

अब हालात ऐसी है, भाई
ना मिली दही, ना रही मलाई।
दूर की बातें, दूर के रिश्ते,
दूर से होती, हंसी हंसाई॥

तुम हंसते हो मुझे देखकर,
मैं रोता हूं, यही सोचकर।
कौन वक्त, कौन घड़ी, पता ना,
किसका जीवन कब, कब नही जमाना॥

अब मुस्कुराना तुम, मुझे सिखा दो,
कोई तो प्यार करें, बंदोबस्त करा दो।
दो समय की रोटी, ना सही,
एक समय, की नसीब करा दो॥

मुझ बुढ़े पेड़ की यही कहानी,
अब कुछ और दिन की जिदंगानी।
समय पता ना कब आ जाए,
कब वक्त हमें ले जाए॥

रोज-रोज की गफलत से तो,
इक दिन तूफां, हमें उठाए।
ना हंसी की चाहत, ना गमों की परवाह,
जिदंगी की कश्मकश से दूर ले जाए॥


हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।


आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
 
 
Comments
सर्वाधिक पढ़े गए
Top
Your Story has been saved!