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man abki sankranti par patange udane ko hai (khichdi par kavita)

मेरे अल्फाज़

मन अबकी संक्रांति पर पतंगे उड़ाने को है

Sunit Mishra

8 कविताएं

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मन बचपन की भांति गलियों में दौड़ जाने को है
दोस्तों संग ठंडे तलाब में डुबकी लगाने को है
अौर बंदिश तो बहुत आ गई है सुनीत जीवन में
मन अबकी संक्रांति पर पतंगें उड़ाने को है।

अौर लेकर तिल, लाई कल नास्ते में
दही-चिउड़ा, खिचड़ी दिन भर खाने को है
मन अबकी संक्रांति पर पतंगे उड़ाने को है।

उन लहलहाते हुए सरसों की छांव में
अब कहां एक झपकी लगाने को है
मन अबकी संक्रांति पर पतंगे उड़ाने को है।

उम्र का, वक्त का इस कदर दबदबा
मन में हम बस कचोट कर रह जाने को है
ये नौकरी, कुछ जरूरी ,कुछ मजबूरी
हम इस बार भी त्यौहार घर से दूर मनाने को है
मन अबकी संक्रांति पर पतंगे उड़ाने को है।

- सुनीत मिश्रा

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