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मेरे अल्फाज़

माटी के मकान

Sunil Shukla

3 कविताएं

माटी के मकानों में लोग मस्त रहते थे, और माटी से जुड़े रहते थे
मन भी माटी से कोमल थे..
धूप, छाओं और बरसात का आंगन में मज़ा लेते थे
घर के बाहर से लोग आवाज़ लगाकर बुलाते थे, और
आवाज़ सुनकर, सब उसे पहचान जाते थे
चारपाई और तख्त घर की शान थे, चाहे बैठें या लेटें, सब आराम के सामान थे
मेहमान को गुड़-पानी पिला देते थे, बहुत हुआ तो नींबू का शरबत बना देते थे
मेहमान भी हफ्ता - दस दिन रुकते थे
लोगों से इतनी मिठास और अपनापन मिलता,
कि जाते समय पलकें भिगोते थे
अब ज़माना बदल गया है...
माटी के मकान अब पत्थर के हो गये हैं
जिसमें पत्थर की तरह अब मन भी सख्त हो गए हैं
आंगन का मतलब बच्चे तो क्या बड़े भी नहीं जानते हैं
अब वो दो - तीन कमरों के फ्लैट की बालकनी से झांकते हैं
"ॐ जय जगदीश हरे " की डोर बेल लगाते हैं
अगर कोई बजाये, तो "अब कौन आया " बड़बड़ाते हैं
मेहमान अगर "फाइव सीटर सोफे" में समां जायें तो ठीक,
नहीं हो माथे पे बल पड़ जाते हैं
ग़र्मी हो या सर्दी सबसे पहले चाय पिलाते हैं …
सजावटी "ड्राइंग रूम" में बनावटी बातों से समय गंवाते हैं आगे पढ़ें

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