आपका शहर Close
Home ›   Kavya ›   Mere Alfaz ›   Bazm-E-Mohabbat.

मेरे अल्फाज़

बज़्म-ए-मोहब्बत

Sunil Mishra

33 कविताएं

653 Views
अक्स पर नाम लिखकर मिटाते रहे,
दर्द बढ़ता ही गया हम मुस्कुराते रहे।
हर तरफ इक साया सा चलता रहा,
फिर भी नज़रें हम उनसे मिलाते रहे।

ये नब्ज थमती गई दिल धड़कते रहे,
जख्म-ए-दिल पर मरहम लगते रहे।
इस कदर तेरी नज़रों की इनायत रही,
तुम आशियां मेरे दिल का जलाते रहे।

हम राह-ए-मोहब्बत पर यूं चलते रहे,
वो जिंदगी से खुद ही नज़रें चुराते रहे।
ये मुकम्मल है किस्मत की नाकामियां,
जख्म मिलता गया हम चोट खाते रहे

हाल-ए-दिल हम अपना बयां करते रहे,
उनकी फितरत से हम खुद सभलते रहे।
जख्म दिल में रहा इक खलिस भी रही,
हम अपने ख्वाबों की दुनिया बसाते रहे।

दिल की हसरत वो तगाफुल करते रहे,
दिल की आहट" भी अपनी बताते रहे।
दिल तड़पता रहा चश्म-ए-नम भी हुई,
आह निकली भी नहीं दिल लुटाते रहे।

अक्स पर नाम लिखकर मिटाते रहे,
दर्द बदता ही गया हम मुस्कुराते रहे।
हर तरफ इक साया सा चलता रहा,
फिर भी नज़रें हम उनसे मिलाते रहे।

स्वरचित लेखन-
सुनील मिश्रा।

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
 
सर्वाधिक पढ़े गए
Top
Your Story has been saved!