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मेरे अल्फाज़

मैं सफर पर चला

Sumit 11

17 कविताएं

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मैं सफर पे चला
हाँ सफर पे चला
है नही ये पता
किस डगर पे चला

रास्ते है कठिन
दूर जाना भी है
ख्वाहिशें है बहुत
उनको पाना भी है
हमसफ़र तो नहीं
रहगुजर भी नहीं
तन्हा चलना है जब
कोई डर भी नही
दिल धुन दे रहा
गा रहा है गला

मैं सफर पे चला
हाँ सफर पे चला

दर्द राहो में हो
या पनाहों में
मुझको बढ़ना है तय
धूप छांव में हो
हैं सामने मुश्किलें
मैने माना नही
मुझको पाना है वो
मैंने ठाना यही
माँ दुआ दे रही
हर साया टला

मैं सफर पे चला
हाँ सफर पे चला


जोश है उमंग है
मन भी विहंग है
कुछ है मलाल भी
माँ का ख्याल भी
कदम-कदम बढ़ चला
रोक सके ना काल भी
ज़िन्दगी गर यद्ध है,
है यद्ध का आगाज़ भी
मुश्किलें गर सर्प है,
तो हूँ मैं बाज़ भी,
देखकर ये अदा
हर दुश्मन जला

मैं सफर पे चला
हाँ सफर पे चला

-सुमित श्रीवास्तव


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