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मेरे अल्फाज़

कुछ प्रकृति पर

sulakshana datta

3 कविताएं

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देखते ही देखते
धूप
हवा हो गयी
कुछ आवारा बादल निगोड़े
कुतर रहे थे पर उसके।

हर दिन
जल्दी नहीं जागता
फ़टाफ़ट नहीं भागता

कभी कभी
नीम की फुनगी पर है रुकता
कभी बरगद की मिट्टी से सने बालों को
करता है स्पर्श

कभी सीधे
धरती के सीने से लगी
नर्म दूर्वा को
सहलाता है
आते ही

किसी किसी दिन
बाहर क्यारी में रखी
अधभरी बाल्टी पानी में डुबकी लगा
अपनी गर्मी उतारता
हल्का हो ऊपर उठता है

दालान में बनी सीढ़ियों को
फिसलपट्टी बना
धड़ाम से
औंधे मुंह गिरता

झेंपता हुआ तुलसी के पीछे
कोने में छुप जाता

जब कोई देख न रहा हो
सरपट भागता

अगले दिन लौटता
मेरे शहर का सूरज।

सुलक्षणा 'रूह'

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