अनोखा मौन प्रेम

                
                                                             
                            एक थी गुड़िया प्यारी सी, एक था गुड्डा भोला सा
                                                                     
                            
वो समय पुराना, माहौल जरा कुछ दबा ढँका था
दोनो संकोची गुड्डा गुड़िया, दोनों बेहद मेधावी थे
संग कॉलेज में पढ़ते थे पर कभी बात न करते थे
टुकुर टुकुर बस एक दूजे को यूँ ही देखा करते थे

दिन थे पखेरू कहाँ ठहरते, तेज गति उड़ जाते थे
कॉलेज के वो स्वप्निल दिन, पंख लगाकर उड़ते थे
गुड्डा गुड़िया बहुत मेहनती, अति लगन से पढ़ते थे
कॉलेज के दिन बीत गए थे गुड्डा गुड़िया बिछुड़े थे
स्तब्ध हृदय से मौन विदा ले आँसू थामे निकले थे

अपनी मेधा के दम पर सम्मानित पद पर पहुँचे थे
गुड्डा गुड़िया नवजीवन के प्रगति पथ पर उलझे थे
अलग अलग शहरों में दोनों नई राह पर चलते थे
कभी कभी फुर्सत के पल में याद पुरानी करते थे
प्रथम प्रेम की मौन सहमति विस्मृत न कर पाए थे

मौसम-मौसम बीत चले थे, नया ज़माना आया था
कई-कई संचार के साधन, मोबाइल भी आया था
अप्रत्याशित एक रोज़, एक नया सवेरा आया था
किसीने गुड्डा गुड़िया को मित्रों के ग्रुप में जोड़ा था
चरम कौतुहल से दोनों ने मोबाइल नंबर पाया था

संकोच छोड़कर एक रोज़ गुड्डे ने फोन लगाया था
बातों में दोनों ने ही खुशियों का खजाना पाया था
रोज़ ढेर सी बातों में समय भी कम पड़ जाता था
एक दूजे का संग साथ दोनों के मन को भाता था
एक दूजे से मिलने का मन दोनों को ही बेहद था

ग्रुप के सारे मित्रों ने अब मिलन सम्मेलन रखा था
अपने उसी शहर में जाना सबके मन को छूता था
तीस बरस के इंतज़ार का अंत जल्द ही होना था
गुड्डा गुड़िया के पाँव भी अब ज़मीन से ऊपर थे
सम्मेलन में जाने की नित उल्टी गिनती करते थे

बहुप्रतीक्षित वो दिन था, समय भी जैसे ठहरा था
तीस बरस के बाद दोनों ने, एक दूजे को देखा था
मित्रगणों के साथ उन्होंने खोया बचपन पाया था
चुहल ठहाके और गप्पों में मीठा समय गुजारा था
गीत ग़ज़ल के समारोह में बढ़कर गाना गाया था

गाने के उस समारोह में गुड्डा गुड़िया खूब मगन थे
तभी अचानक एक मित्र ने गुड़िया को बुलाया था
मित्र के कहने पर उसने एक युगल गाना गाया था
मित्र के संग गुड़िया का गीत गुड्डा सह न पाया था
दुखी हृदय से वो बेचारा समारोह से चला गया था

गीत ख़तम कर गुड़िया ने गुड्डे को हाॅल में ढूँढा था
उसे न पाकर उसने उसको तुरंत फोन लगाया था
फोन पर गुड्डे ने अपनी तबियत का रोना रोया था
लेकिन गुड़िया को गुड्डे की हालत का अंदाजा था
झटपट से जाकर गुड़िया ने गुड्डे को समझाया था

अधिकार से उसने गुड्डे को समारोह में खींचा था
नैनों की गागर ने उस पल प्रेम नीर छलकाया था
बिना कहे ही दोनों ने दोनों के मन को जाना था
बचपन का वो मौन प्रेम अभी दिलों में बाकी था
कैसा वो आकर्षण था और जाने कैसा बंधन था

प्रेम अनोखा, अपरिभाषित, अकथ, गूढ़ पहेली है
देश काल और जन्म से परे, नहीं उम्र का सेवक है
बरस हज़ारों गुज़र जाएँ, पर प्रेम जवां ही रहता है
जड़ें अगर हों गहरी तो फिर प्रेम अमर कहलाता है
इसीलिए तो प्रेम का किस्सा कोई भुला न पाता है

- डॉ. सुकृति घोष
ग्वालियर, मध्य प्रदेश


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8 months ago
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