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मेरे अल्फाज़

उस रब को भी रोना आया।

Sujeet Mishra

497 कविताएं

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बहुत ही भयावह था वो मंजर ।
जिसे अभिव्यक्ति की आजादी का मुखौटा पहनकर फैलाया गया ।।
वो जलती कारें, बसे, घर और खून से लथपथ वो पोलिस अफसर।
ये सब देख कर उपर बैठे उस रब को भी रोना आया ।।
:- सुजीत कुमार मिश्रा प्रयागराज।


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