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मेरे अल्फाज़

परों का ख़ाक होना

Sujeet Mishra

144 कविताएं

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शायद , बड़ी बात है आजाद होना ।
मुमकिन नहीं सब याद होना ।।
यूं ही नहीं उड़ता गगन पे स्वछंद परिंदा ।
मुमकिन है कि उसके परों का ख़ाक होना ।।

:- सुजीत कुमार मिश्रा, प्रयागराज ।


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