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मेरे अल्फाज़

अधीर मत करो

Sudhir Khatri

270 कविताएं

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अधीर मत करो
तुम मत दो ह्दय का प्यार,
यह आभार मगर अधीर मत करो,

दो ना मुझे हाँस-सिंगार ,
यह सविकार,अखियँन- नीर मत दो,

तपती घरती घटाओं के गोद में भी,
छलक पड़ी मंगल-मिलन के मौद में भी,

और बोलीं कण्ठ में भर रुदन स्वर,
मेघ भी  बिजिलियों की आमंत्रणा पर,
दो ना अमृत-सी शीतल जल धार,
यह स्वीकार ,अधीर मत दो,

तुम ना दो ह्दय का प्यार,
यह स्वीकार मगर अधीर मत दो,

जब निशा में चूमता आकाश था,
और फिर सरकता भुज-पास था,
सजल रजनी सा था प्रेम का तार,
व्योम मेरे नीलिमा की प्रेरणा पर,
दो ना मुझे तारों के हार,
यह स्वीकार, लेकिन अधीर मत दो,


- मगर अखिंयन नीर मत दो

- कवि खत्री भेल

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