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मेरे अल्फाज़

छल टपक रहा है

Sudher Mohan

29 कविताएं

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हम दो और हमारे दो यहां, दिवारो की शान बनी,
जनसंख्या नियंत्रण पर ऐसे, भारत की पहचान बनी।
कूछ नारों से छल टपक रहा,कुछ नारों में लाचारी है,
सत्ता के आशन को कैवल, वोटोंं की बीमारी है।
परिवार नियोजन बना विभ्ााजन, और बनगया ये दस्तूर,
मेरे संग हैं बीवी बच्चें, मात पिता हैं घर से दूर।
पढ लिख्ा कर कुछ लोगों ने, क्या खूब लगाया नारा,
पति पत्नि ओर दो बच्चें, परिवार ये उनका सारा।
जिसने जन्म दिया है इनकों, उनकोंं पीछे छोडा,
ज्ञानवान हैं लोग बहुत ये, नैतिकता को तोडा।
भूल गये क्या है मर्यादा, समंझेंं इनका गलत इरादा,
मात पिता को ना जो समंझें, वो क्या जानेंं दादी दादा।
साक्षरता को लगा ग्रहण, भाई नही अब इन्हेंं सहन,
इस हालत में कौन ये मानें, इनके भी है कोई बहन।
अपनों का हित कर ना पाए, परहित वो क्या कर पाऐंगें,
झूठी शान की अग्नि में, एक दिन यूंही जल जाऐंगें।
हम दो ओर हमारे दो का, वाक्य समझा जो मीठा,
इन शब्दोंं की कडवाहट से, परिवार उसका टूटा।
जनसंख्या पर फिर गम्भीर, हुई सरकार की नियत नैक,
अब दिवारों पर लिख्ावाया, हम दो और हमारा एक।
इन नारों से जला हुआ है, अभितलक पूरा परिवेष,
परिवार को तोडके दी है, नैतिकता को गहरी ठेस।
कुप्रभाव पडा इन नारोंं, से भाषा शैली पर खास,
मां तो रहती पास में मेरे, पिता बडे भाई के पास।
बदली संस्क्रति भारत की, पुत्र बने हैं अन्न्दाता,
मां भारती को मां क्या बोलें, जो जननी से तोडें नाता।
नो महीने जो पेट में रखे, उसका ऋण्ा हम क्या देंगें,
बच्चों को जो दिया हैै हमनें, उनसे वो सब ही लेंगें।
जनसंख्या विस्तार यहां बस, सिंहासन का खोट है,
राजनिती की ढील यहां बस, मानवता पर चौट है।
सत्ता का क्या है कहदेगी, हम दो ओर हमारा एक,
जीने मरने जेसी बातों, को भईया तू खुद ही देख।
अल्हा की ये देन हों चाहें, या ईश्वर का हों वरदान,
बढती हुई जनसंख्या से ही, आज परेशांं हिंदूस्तान।

-सुधीर मोहन शर्मा

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