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मेरे अल्फाज़

धर्म-युद्ध का कुरूक्षेत्र...

Sudher Mohan

29 कविताएं

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सीमा रक्षक का जीवन है,बलिदानोंं की वीथी पर
अपना राष्ट्र जयी होता,इस परम्परा इस रीति पर 
वो ठंडी-गर्म हवाओं के संग,तूफानों को झेल रहें
और पाषाणों की छाती पर,वो बारूदों से खेल रहे 
जिनके कारण हम सब निभर्य हैं,और राष्ट्र सम्मानित है
वो गौरव पत्थर बाजोंं के, हाथो फिर क्यों अपमानित है 
जो धधक रहा है रूधिर, उसे क्यों पानी करना चाहते हो
सैनिक के हाथ बांधकर क्यों,नादानी करना चाहते हो 
राजमुकुट तो चमक रहा पर,राष्ट्रमुकुट तो जर-जर है
जिनको कहते नादान हो तुम,अतंकी उनके घर-घर है
कैवल सैनिक का नही है ये,अपमान समूचे भारत का
क्यों भूल रहे सत्ता वालो,ये राष्ट्र भी है महाभारत का 
घाटी में पंडितोंं का जिस दिन,गूंजा रूदन और आर्तनाद
तभी विधर्मी कर बैठे थे,कुरूक्षेत्र का शंखनाद 
अब धर्मयुद्ध का कुरूक्षेत्र,इस घटी को ही नियुक्त करों
ऐ सत्ताधीष तुम अपने को,जनता के ऋण से मुक्त करों 

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