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मेरे अल्फाज़

वो...

Sudhanshu Ankit

12 कविताएं

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कब्र पे मेरी अब्र बन कर छाये हैं 
हैं मुमकिन ज़माने के सताए हैं वो ।।

मुझे अब भी महफूज़ करने में लगे हैं वो 
न जाने किन किन गली से गुजरे है वो ।।

मेरी प्यास बुझाने का जुनूँ तो देखो इनका
खुद को कतरा कतरा बहाते हैं वो ।।

- सुधांशु अंकित

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